युवैव धर्मशीलः स्यादनित्यं खलु जीवितम् ।
कृते धर्मे भवेत् कीर्तिरिह प्रेत्य च वै सुखम् ॥
अर्थ : युवावस्थामें ही सबको धर्मका आचरण करना चाहिए; क्योंकि जीवन निःसन्देह अनित्य है । धर्माचरण करनेसे इस लोकमें मनुष्यकी कीर्तिका विस्तार होता है और परलोकमें भी उसे सुख मिलता है ।
मन्योर्हि विजयं कृष्णे प्रशंसन्तीह साधवः ।
क्षमावतो जयो नित्यं साधोरिह सतां मतम् ॥
अर्थ : युधिष्ठिर कहते हैं : कृष्णे ! साधु पुरुष क्रोधको जीतनेकी ही प्रशंसा करते हैं । सन्तोंका यह मत है कि इस जगतमें क्षमाशील साधुपुरुषकी सदा जय होती है ।
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