दुःखं विद्यादुपादानादभिमानाच्च वर्धते ।
त्यागात् तेभ्यो निरोधः स्यान्निरोधज्ञो विमुच्यते ॥
अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं – शरीरके ग्रहण मात्रसे दुःखकी प्राप्ति निश्चित समझनी चाहिए । शरीरमें अभिमान करनेसे उस दुःखकी वृद्धि होती है । अभिमानके त्यागसे उन दुःखोंका अन्त होता है । जो दुःखोंके अन्त होनेकी इस कलाको जानता है, वह मुक्त हो जाता है ।
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गुणानां साम्यमागम्य मनसैव मनोवहम् ।
देहकर्मा नुदन् प्राणान्तकाले विमुच्यते ।
अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं – जो केवल शरीरकी रक्षाके लिए भोजन आदि कर्म करता है, वह अभ्यासके बलसे गुणोंकी साम्यावस्थारूप निर्विकल्प समाधि प्राप्त करके मनके द्वारा मनोवहा नाडीको संयममें रखते हुए अन्तकालमें प्राणोंको सुषुम्ना मार्गसे ले जाकर संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है ।
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