सम्मानश्चावमानश्च लाभालाभौ क्षयोदयौ ।
प्रवृत्ता विनिवर्तन्ते विधानान्ते पुनः पुनः ॥
अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं : सम्मान-अपमान, लाभ-हानि तथा उन्नति-अवनति ये पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार बार-बार प्राप्त होते हैं और प्रारब्ध भोगके पश्चात निवृत्त हो जाते हैं ।
सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोsशुचिः ।
त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ॥
अर्थ : भरद्वाज मुनिके द्वारा यह पूछनेपर कि कौनसा कर्म करनेपर मनुष्य शूद्र होता है ? भृगु ऋषि बताते हैं : जो वेद और सदाचारका परित्याग करके सदा सब कुछ खानेमें अनुरक्त रहता है और सब प्रकारके कार्य करता है, साथ ही बाहर-भीतरसे अपवित्र रहता है, वह शूद्र कहा गया है ।
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