यः कामानाप्नुयात् सर्वान् यश्चैतान् केवलांस्त्यजेत् ।
प्रापणात् सर्वकामानां परित्यागो विशिष्यते ॥
अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरको बताते हैं : जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओंको पा लेता है तथा जो इन सबका केवल त्याग कर देता है – इन दोनोंके कार्योंमें समस्त कामनाओंको प्राप्त करनेकी अपेक्षा उनका त्याग ही श्रेष्ठ है ।
न तृप्तिः प्रियलाभेsस्ति तृष्णा नाद्भिः प्रशाम्यति ।
सम्प्रज्वलति सा भूयः समिद्भिरिव पावकः ॥
अर्थ : प्रिय वस्तुओंका लाभ होनेसे कभी तृप्ति नहीं होती । बढती हुई तृष्णा जलसे नहीं बुझती । ईंधन पाकर जलनेवाली आगके समान वह और भी प्रज्ज्वलित होती जाती है ।
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