दुर्लभम् त्रैमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकं । मनुष्यत्वम् मुमुक्षत्वम् महापुरुषसंश्रय ।। – विवेकचूडामणि
आद्यगुरु शंकराचार्यके अनुसार तीन बातोंका एक साथ होना दुर्लभ है और यह मात्र देवकृपासे साध्य हो सकता है –
१. मनुष्यकी योनि
२. मुमुक्षुत्व
३. सन्तका सान्निध्य, मार्गदर्शन एवं कृपा मिलना
अतः यदि आपको ईश्वरने मनुष्य योनि दी है और आपके पूर्व जन्मोंके पुण्यके कारण आपको किसी सन्तका सान्निध्य एवं मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है तो अपने अन्दर मुमुक्षुत्वका गुण आत्मसात करनेका प्रयास करें; क्योंकि मनुष्य योनि और सन्तका सान्निध्य एवं मार्गदर्शन यह प्राप्त करना हमारे हाथमें नहीं होता । तुलसीदासजीने कहा है ‘बडे भाग मानुष तन पावा’ अर्थात् मनुष्य योनि सौभाग्यसे मिलता है और सन्त सान्निध्य ईश्वरकी कृपासे मिलता है; किन्तु मुमुक्षुत्वके गुणको आत्मसात करना हमारे क्रियमाण कर्मपर निर्भर कर सकता है, इस हेतु अपने अन्तर्मनमें साधनाके महत्त्वको अंकित करें, सन्त साहित्यका अभ्यास कर, योग्य साधना करें तथा आपके जीवनका मूल लक्ष्य ईश्वरप्राप्ति है, यह ध्येय निर्धारित कर अपने अनमोल मनुष्य जीवनका सदुपयोग करें । – तनुजा ठाकुर
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