सुख और दु:खकी अनुभूति विषयोंमें आसक्तिके कारण होती है, जो साधनाकर अपने षड्रिपुओंपर विजय प्राप्त कर लेते हैं उनका मन चाहे संसारकी माया रूपी बगियामें हो या पर्वतकी कन्दराओंमें, वह स्थिर ही रहता है । यथार्थमें माया बुरी नहीं है, मायासे आसक्ति बुरी होती है; अतः आसक्ति नष्ट हो जानेपर मायाके प्रलोभन मनको अस्थिर नहीं कर पाती है और ‘ज्ञानी’ मायामें निस्पृह रहकर, उससे निर्मित सुख-दुःखका भोग सहज या आनन्दपूर्वक सहन करते हुए मनको अनुभूत होनेवाली सर्व अवस्थाओंसे मुक्त रहते हैं । अष्टावक्र गीतामें कहा गया है –
हातुमिच्छति संसारं रागी दु:खजिहासया ।
वीतरागोहि निर्दु:खसतस्मिन्नपि न खिद्यति ।।
अर्थात जो संसारमें आसक्त हैं, वे संसारका परित्याग अपने कष्टोंसे भागने हेतु करना चाहते हैं; किन्तु जो अनासक्त हैं वे दु:खोंसे मुक्त होते हैं और उन्हें संसार भी कष्टप्रद नहीं लगता है ।
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