अपने इष्टके दर्शन हेतु भक्तकी व्याकुलता कैसी होती है ?


अजातपक्षा इव  मातरं  खगाः ।
स्तन्यं यथा वत्सतरा: क्षुधार्ता:  ।।
प्रियं प्रियेव व्युषितं  विषण्णा ।
मनोsरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्  ।।

– श्रीमद् भागवत पुराण
अर्थ :
जैसे पक्षियोंके पंखहीन बच्चे अपनी मांकी प्रतिक्षा करते हैं, जैसे भूखे बछडे अपनी मांके दूध पीनेके लिए आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्नी अपने प्रवासी प्रियतमसे मिलनेके लिए व्याकुल रहती है वैसे ही, हे कमलनयन ! मेरा मन आपके दर्शनके लिए विह्वल है !



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