किस प्रकारके धनका नाश नहीं होता ?


धर्ममूलं श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते ।

अर्थ : धर्मके मार्गका अनुसरण कर, अर्जित किया गया धन न कभी घटता है न ही उसका नाश होता है !



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