मांसाहारसे सम्बन्धित सर्व कृतियोंका पापकर्म होना


मांसाहार करनेवाले एवं इस सम्बन्धमें लिप्त प्रत्येक व्यक्ति किसप्रकार पापके अधिकारी बनते हैं इस सम्बन्धमें मनुस्मृतिका यह श्लोक उल्लेखनीय है –

अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः ।। – मनुस्मृति                                                     

अर्थात मारनेकी आज्ञा देनेवाला, पशुको मारनेके लिए लेनेवाला, विक्रय करनेवाला, पशुको मारनेवाला, मांसको क्रय एवं विक्रय करनेवाला, मांसको पकानेवाला और मांस खानेवाला, ये सभी हत्यारे हैं ।

इसीलिए हिन्दू धर्ममें मांसाहारको प्रत्येक धर्मग्रन्थने आलोचना की है । सत्त्वगुण आधारित हमारी वैदिक संस्कृतिमें यदि रजोगुणी एवं तमोगुणी वर्ग यदि अपनी प्रवृत्ति अनुरूप मांसाहर करते थे तो भी उन्हें व्रत-त्योहार या धार्मिक उत्सवोंके समय अपनी जिह्वापर नियन्त्रण लाने हेतु मांसाहार नहीं करनेका शास्त्रीय निर्देश है और हिन्दू धर्ममें वर्षके दो-तिहाई भागमें गृहस्थोंके लिए कोई न कोई व्रत-त्योहार या धार्मिक उत्सव होते ही हैं जिसमें सात्त्विक आचार-विचारके साथ ही आहारका सात्त्विक होना अति आवश्यक होता है । इससे हमारे मनीषियोंकी सूक्ष्म चिन्तन मानव जातिके उत्थान हेतु कैसे समर्पित था ? यह ज्ञात होता है । – तनुजा ठाकुर



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