
इच्छाएं एवं वासनाएं अनन्त होती हैं, कोई भी मनुष्य एक जीवन कालमें तो क्या, अनेक जन्म लेकर भी उनकी तृप्तिकर, उनसे मुक्त नहीं हो सकता, इसलिए आद्य गुरु शंकराचार्य कहते हैं –
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम् ।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम् ॥१५॥
अर्थात शरीर झुक गया है, सिरके केश श्वेत हो गए हैं, मुखमें दांत नहीं हैं, वृद्ध होनेपर व्यक्ति लाठीके सहारे चलता है; परंतु इच्छाकी गांठको ढीला नहीं कर पाता है ।
इच्छाओंकी सतत तृप्ति आगमें घी डालनेका कार्य करती हैं । एक इच्छाके पूर्ण होते ही दूसरी इच्छा स्वतः ही जागृत हो जाती है एवं इस प्रकार मनुष्य उसकी तृप्तिमें सम्पूर्ण जीवन व्यस्त रहता है । वस्तुतः मृत्यु पश्चात भी इन्हीं इच्छाओं एवं वासनाओंके कारण लिंगदेह भिन्न योनियोंमें भटकती हैं एवं कष्ट पाती हैं । इसलिए इच्छाओंकी तृप्ति धर्मके आधारपर करते हुए, उनका नियमन करना चाहिए और यह मात्र साधनाद्वारा ही साध्य हो सकता है । साधनासे मनके संस्कार केन्द्र न्यून होकर अन्ततः नष्ट हो जाते हैं, जिससे इच्छाओंका निर्माण ही बन्द हो जाता है, यही साधनाका मूल महत्त्व है । – पूज्या तनुजा ठाकुर
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