अन्नदानं परं दानं विद्यादानं अत: परम् ।
अन्नेन क्षणिका तॄप्ति: यावज्जीवं च विद्यया ।।
अर्थ : अन्नदान श्रेष्ठ दानमें आता है; परंतु विद्यादान उससे भी श्रेष्ठ है। अन्नसे क्षणिक तृप्ति होती है और विद्या आजीवन साथ रहती है। अतः विद्यादान, सर्वश्रेष्ठ दान है।
अन्नदान अर्थात जो भूखे हैं, उन्हें तृप्त करना श्रेष्ठ दान है; परन्तु विद्याका दान उससे भी श्रेष्ठ है । यहां विद्याका अर्थ है, ‘सा विद्या या मुक्तये’ । आजकल धन अर्जित करनेके विविध पद्धतियोंको मैकालेकी शिक्षण पद्धतिमें विद्या कहा जाने लगा है; परन्तु हमारी भारतीय संस्कृतिमें जिस ज्ञानसे मुक्तिका मार्ग प्रशस्त हो, ऐसे ज्ञानको विद्या कहा गया है और इस दानको श्रेष्ठतम दान कहा गया है; क्योंकि इसी विद्याके कारण हम जन्म-मृत्युके चक्रसे निकल पाते हैं । इसलिए आजके मैकालेके शिक्षणको विद्याकी उपाधि नहीं दी जा सकती है; क्योंकि यह तो मनुष्यको मात्र भोगकी ओर प्रवृत्त करती है । विद्या तो जीवको ईश्वरकी ओर उन्मुख करती है, जो ज्ञान इसके विपरीत प्रवृत्ति निर्माण करे, वह शिक्षण आसुरी है !; इसलिए वैदिक संस्कृतिमें विद्या, जीविका और उपजीविका दोनों हेतु दी जाती थी, जीविका अर्थात ईश्वरप्राप्ति करना एवं इस प्रक्रियामें जो क्रिया सहायक होती थी, उसे उपजीविका कहते थे; अतः भारतीय संस्कृतिमें लोग अपना व्यवसाय भी करते थे और साधना भी । इस देशमें पुनः इसी विद्याको पुनर्जीवित करनेकी आवश्यकता है; क्योंकि आजकी उपजीविकाके साधन, अपने मूल लक्ष्यसे विमुख होनेके कारण आसुरी हो चुके हैं, तभी तो वैद्य, अभियन्ता, कलाकार, पुरोहित, न्यायाधीश इत्यादि आज अपने व्यवसायमें व्यभिचार करते हुए दिखाई देते हैं, उन्हें यह ज्ञात ही नहीं कि उनकी उपजीविकाका साधन जीवके मुख्य लक्ष्य अर्थात आध्यात्मिक प्रगति हेतु पोषक नहीं है । – तनुजा ठाकुर
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