शत्रुश्चैव हि मित्रं च न लेख्यं न च मातृका । यो वै संतापयति यं स शत्रु: प्रोच्यते नृप ॥ – महाभारत २.५५.१०
अर्थ : हे राजन, यह हमारा शत्रु है और यह हमारा मित्र है यह किसीके ऊपर कहीं चिन्हित या अक्षरसे अंकित नहीं होता ; अतः जिससे जिसे संताप या कष्ट हो उसे उसका शत्रु कहते हैं !
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