त्यागसे उच्च स्थान प्राप्त होना


 संग्रहैकपर: प्राय: समुद्रोपि रसातले ।
दातारं जलदं पश्य गर्जन्तं भुवनोपरी ।।                                                                                  
अर्थ : जलका संग्रह करनेवाले समुद्रका स्थान रसातल है और जलको अर्पण करनेवाले बादलका स्थान ऊपर गगनमें हैं ।
इस सुभाषितमें लेखक यह बताना चाहते हैं कि जिसमें दान देनेकी  प्रवृत्ति हो उसे उच्च स्थान अर्थात श्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है और जो मात्र संग्रह करता है वह स्वार्थी होता है और उसे तुच्छ स्थान प्राप्त होता है ! समुद्र मात्र संग्रहकर्ता है; अतः उसका जल भी खारा होता है और बादल जल देता है और उसका जल शुद्ध निर्मल और मीठा होता है । उसी प्रकार जो व्यक्ति  मात्र स्वके लिए सब कुछ एकत्रित  करते हैं, उनमें अहं रूपी खारापन कब आ जाता है, यह उन्हें भी ज्ञात नहीं होता है और वही उसके पतनका कारण भी बनता है; परंतु जो परहितके लिए अपना सर्वस्वका त्याग करता है, वह इस संसारमें पूजनीय बन जाता है और समाजका मुकुटमणि बन सुशोभित होता है। स्वार्थी जीव अपने कुंठित संसारमें रहते हुए एक दिवस मृत्युको कब प्राप्त होता है ,यह बहुत बार समाजको भी ज्ञात नहीं हो पाता है, वहीं त्यागी पुरुषोंके जन्म तिथि एवं पुण्यतिथि जब तक सूर्य और चन्द्रका अस्तित्त्व होता है तब तक सम्मानपूर्वक मनाया जाता है। हमारी भारतीय संस्कृतिका मूल आधार त्याग ही था जबसे लोभ और स्वार्थने इसका स्थान ले लिया है भारतने विश्वगुरुका स्थान खो दिया है। – तनुजा ठाकुर



Comments are closed.

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution