अपवित्र वासनाको करें, क्रियमाणसे नियन्त्रित


द्विविधो वसनाव्यूहः शुभश्चैवाशुभश्च ते  वासनौघेन शुद्धेन तत्र चेदपनीयसे

तत्क्रमेण शुभेनैव पदं प्राप्यस्यसि शाश्वतम। अथ चेदशुभो भावो यत्नात् जेतव्य एव सः । –   योगवशिष्ठ (२: ४,५)

अर्थ : वासना दो प्रकारके होते हैं, पवित्र और अपवित्र । यदि पवित्र वासनाके प्रवाहमें रहें तो शाश्वत सत्यकी प्राप्ति होगी  और यदि अपवित्र वासनाओंकी अधिकता हो तो उसे क्रियमाण कर्मसे नियंत्रण करना चाहिए ।

 

 



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