श्रीगुरु उवाच


देवालयोंके उत्सव हों, यात्रा हो अथवा गणेश विसर्जनकी शोभायात्रा, सर्व अवसरोंपर आधुनिक अथवा पाश्चात्य संगीतकी तालपर मद्यपानकर नाचनेवाले हिन्दू दिखाई देते हैं । ऐसे कृत्योंसे वह कार्यक्रम देवताका नहीं; अपितु असुरोंका बन जाता है । अन्य धर्मियोंके किसी धार्मिक कार्यक्रममें इस प्रकारका दृश्य नहीं दिखाई देता । ‘मद्य पीकर नाचना, यह धार्मिक कार्यक्रमका एक भाग ही है’, इस प्रकारका संस्कार नई पीढीपर अंकित हुआ है । ऐसा न हो, इसके लिए पूर्णतः सतर्क रहें ! ऐसे कृत्योंको रोकना भी साधना है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (https://sanatanprabhat.org)


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