१. शंकराचार्यने ८ वर्षकी आयुमें तथा समर्थ रामदासस्वामीने १२ वर्षकी आयुमें साधना करने हेतु घर त्याग दिया, तब ‘वे कहां जाएंगे ? कहां रहेंगे ? उनका ध्यान कौन रखेगा ?’, इसकी चिन्ता उनके पालकोंने नहीं की, इसके विपरीत सनातान संस्थाके आश्रममें आधुनिक वैद्योंसह सर्व सुविधाओंके होते हुए भी कुछ एक आदर्श पालकोंको छोड बहुसंख्य पालक बालकोंको साधना हेतु आश्रममें भेजनेके इच्छुक नहीं होते । इतना ही नहीं, घरपर भी वे अपनी बच्चोंकी साधना करनेका विरोध करते हैं तथा मायामें अटकानेका अधिकाधिक प्रयत्न करते हैं । उनसे अधिक पापी कोई और होगा क्या ?
२. कुछ पालक बालकोंको भावनात्मक स्तरपर कहते हैं, ‘हमने बचपनसे आजतक पालन-पोषणकर शिक्षण इत्यादि सब दिया, अब तुम्हें आश्रम न जाकर घरपर रहकर हमारी चिन्ता करनी चाहिए ।’ ऐसे पालक यह समझ लें कि शंकराचार्य ८ वर्षकी आयुमें तथा समर्थ रामदासस्वामी १२ वर्षकी आयुमें गृहत्यागकर गए, तब उनके पालकोंके ऐसे उद्गार नहीं थे । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
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