‘कालमहात्म्यानुसार कोई बात अभी मत करो, आगे करो’, ऐसा कहा तो, कुछ हिन्दुत्ववादियोंको उसका महत्त्व समझमें नहीं आता । उन्हें लगता है, ‘मेरे सामने हिन्दुओंपर तथा गायोंपर अत्याचार हों, तो मैं शान्त कैसे बैठूं ? भले ही प्राण जाएं; परन्तु मैं कृति करूंगा !’ वे आगेके सूत्रोंपर ध्यान दें तो, उन्हें कालमहात्म्य समझमें आएगा –
१. ग्रीष्मकालमें खेतोंमें अनाज नहीं बोते; अपितु वर्षाकालतक रुकते हैं ।
२. द्रौपदीका राज्यसभामें अपमान हुआ तो कृष्णने तत्क्षण कौरवोंका नाश नहीं किया; अपितु १३ वर्षोंके पश्चात किया ।
३. श्रीराम १४ वर्ष वनवासमें रहे, तत्पश्चात उन्होंने रावणका वध किया । शत्रुके सन्दर्भमें योग्य समयकी प्रतीक्षा करनेसे, स्वतन्त्रता सैनिकोंकी भांति, फलनिष्पत्ति बिना ‘फांसी’पर नहीं चढना पडता ! विजय निश्चित प्राप्त होती है । योग्यकाल आनेतक रुकनेसे दुर्जनोंके पाप बढनेसे भी उनका नाश करना सुलभ होता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
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