जो चिकित्सक नहीं, वह औषधि नहीं दे सकता । जो अधिवक्ता नहीं, वह न्यायालयमें वाद-परिवाद नहीं कर सकता । ऐसा होते हुए भी राष्ट्र तथा धर्ममें अज्ञानी तथा इस सम्बन्धमें कुछ न करनेवाली जनता, राज्यकर्ताओंका चयन करती है, यह मूर्खताकी पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है ? – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक सनातन संस्था
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