श्रीगुरु उवाच


जिन साधकोंका नामजप अच्छेसे होता है, उन्हें प्रार्थना करनेकी आवश्यकता नहीं । प्रार्थनामें अनेक शब्द होते हैं और नामजपमें अल्पशब्द होते हैं; इसीलिए प्रार्थनाके स्थानपर नामजपसे अनेकसे एकमें प्रवास होता है । वैसे प्रार्थना भी एक प्रकारकी स्वेच्छा है । उसे भी नष्ट करना है । साधनामें स्वेच्छासे परेच्छाकी ओर एवं आगे ईश्वरेच्छाकी ओर जाना है ।



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