वसिष्ठ ऋषि, विश्वामित्र ऋषि, भृगु ऋषि, अत्रि ऋषि, अगस्ति ऋषि, नारद मुनि आदिकी शिक्षाएं और नाम युगों-युगोंसे चले आ रहे हैं । इसके विपरीत, बुद्धिजीवियों और धर्मद्रोहियोंके नाम १-२ पीढियोंके पश्चात लोग भूल जाते हैं । ऋषि-मुनि सत्यवादी थे, इसलिए काल उनके नाम और उनकी ज्ञानको छू नहीं सका । इसके विपरीत, बुद्धिमानों, धर्मद्रोहियों तथा बुद्धिजीवियोंका कहा हुआ सत्य नहीं होता; इसलिए उनका नाम और शिक्षा कालप्रवाहमें लोग भूल जाते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
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