श्रीगुरु उवाच


सीखनेसे नहीं अपितु सेवा परिपूर्ण एवं भावपूर्ण करनेके कारण आनन्द प्राप्त होता है !
सीखनेमें आनन्द नहीं होता है; वह बौद्धिक सुख होता है । सेवा परिपूर्ण एवं भावपूर्ण करनेके कारण आनन्द मिलता है; अतः मुझे नवीन कुछ सीखने हेतु नहीं मिला, यह दुख करनेकी अपेक्षा, मुझे मिली सेवा मैं परिपूर्ण एवं भावपूर्ण करता हूं क्या ?, इस बिन्दुपर साधकने ध्यान देना चाहिए ।



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