१. मद्य, धूम्रपान, बीडी, तम्बाकू इत्यादि मादक (नशीले) पदार्थोंका उत्पादन ही नहीं हो, ऐसे कृत्य करनेकी अपेक्षा शासन केवल उनके अनिष्ट परिणामोंके सन्दर्भमें अपने विचार वक्तव्य करता है ।
२. नदीका जल प्रदूषित नहीं हो, इसकी अपेक्षा शासन जलशुद्धिकरणका केवल बहाना करता है ।
३. अधिक मात्रामें अवैध रूपसे (तस्करीद्वारा) वृक्ष काटनेवालोंपर शासन किसी भी प्रकारकी कार्रवाई नहीं करता तथा ‘पेड लगाओ, पेड बचाओ’के समान अनेक कोटि रुपएके व्यय करनेवाले अभियानद्वारा पर्यावरण रक्षाका बहाना करता है ।
४. समाजको नीतिशून्य करनेवाली पुस्तकें, नियतकालिक चित्रपट, दूरचित्रप्रणालीके कार्यक्रम, संकेतस्थल इत्यादिपर प्रतिबन्ध लगानेकी अपेक्षा शासन नैतिकमूल्योंका शिक्षण देनेका नाटक कर रहा है ।
५. भ्रष्टाचारके लिए उत्तरदायी राजनेता तथा उच्चपदस्थ अधिकारियोंपर कार्रवाई करनेकी अपेक्षा कनिष्ठ अधिकारियों तथा कर्मचारियोंको सप्रमाण पकडकर शासन भ्रष्टाचार निर्मूलनका नाटक कर रहा है ।
६. जातीय तथा धार्मिक कसौटियोंपर आरक्षण देकर तथा पृथक योजना आरम्भकर समाजमें विभाजन करनेवाला शासन, दूसरी ओर सामाजिक एकता निर्माण करनेका नाटक कर रहा है ।
७. आतंकवादियोंके सन्दर्भमें शून्य संवेदनशीलता प्रदर्शित करनेकी अपेक्षा आतंकवादियोंको मानदेय एवं शासकीय ‘नौकरी’ देकर रक्षा करनेवाला शासन आतंकवादका समूल उच्चाटन करनेकी घोषणा करता है । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले संस्थापक, सनातन संस्था (५.४.२०१५)