अध्यात्ममें गुरुप्राप्ति होना अर्थात शिष्य पद प्राप्त करना, यह आध्यात्मिक यात्राका एक महत्वपूर्ण चरण है । शिष्य होनेके पश्चात गुरुकी सर्व आज्ञाका पालन करें, ऐसा लगता है । आज्ञापालन होनेके कारण मन एवं बुद्धिके लयकी प्रक्रियाको गति मिलती है; फलस्वरूप अन्य कोई भी साधनामार्गकी अपेक्षा मनोलय और बुद्धिलय शीघ्र होनेके कारण शिष्य सन्त पदपर शीघ्र आसीन होता है । गुरु शिष्यके रूपमें स्वीकार करें, इस हेतु पहलेसे ही आज्ञापालनकी प्रवृत्ति होनी चाहिए । इसलिए अपने मार्गदर्शक, उत्तरदायी साधक इत्यादिके आज्ञाका पालन करनेकी प्रवृत्ति डालनी पडती है ।
– परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
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