किसीको क्रिकेट, किसीको संगीत, किसीको नृत्य, किसीको घूमना, भिन्न स्थानोंपर जाना, इसप्रकार विविध रुचियां होती हैं । इसीप्रकार कुछको भजन, कीर्तन या प्रवचनमें जाना, तो कुछको सन्तोंके पास जाना रुचिकर होता है । पहली रुचिसे दूसरी रुचि अधिक योग्य है; परन्तु इससे एक हानि होती है, वह यह कि हम इस भ्रममें रहते हैं कि हम साधना करते हैं । ईश्वर-प्राप्ति हेतु तन-मन-धनका त्याग करना पडता है, यह उनकी समझमें नहीं आता; अतः सात्त्विक रुचि होते हुए भी साधनामें प्रगति नहीं होती । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
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