न्यायालयीन प्रक्रियामें जनताका हर प्रकार दोहन करनेवाले लोकतन्त्रको ही फांसीपर चढाकर हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना करें !


१. लोकतन्त्रकी न्यायप्रणाली

अ. शारीरिक दोहन : अपना सर्व कार्य छोडकर निश्चित दिनांकको न्यायालयमें उपस्थित रहना पडता है । कई बार पुलिसकी यातनाएं भी सहनी पडती हैं ।
आ. आर्थिक दोहन : अधिवक्ताओंके शुल्क हेतु प्रतिवर्ष अनेक कोटि रुपयोंका व्यय होता है ।
इ. मानसिक दोहन : देशभरमें ३ कोटि १४ लक्ष प्रकरण निर्णय हेतु प्रतीक्षारत हैं । प्रत्येक प्रकरणमें दो पक्ष होते हैं । प्रत्येक पक्षमें कुटुम्बीय, निकट सम्बन्धी तथा हितचिन्तक मिलाकर लगभग १५ व्यक्तियोंको न्यायालयके निर्णय हेतु चिन्ता होती ही है । दोनों पक्ष मिलाकर ३० जन चिन्तारत होते हैं । इस प्रकार ३ कोटि १४ लक्ष प्रकरणोंसे सम्बन्धित ९४ कोटि ५० लक्ष व्यक्ति वर्षोंतक चिन्तारत रहते हैं ।
ई. न्यायप्राप्तिकी निश्चितता न होना : इतने सारे कष्ट सहन करनेपर भी न्याय प्राप्तिकी निश्चितता नहीं होती; कारण न्यायतन्त्रमें सर्वत्र भ्रष्टाचार है । इस कारण जनताको असह्य (कष्टप्रद) जीवन जीना पडता है । इससे सहज ही रक्तदाब, निद्रानाश इत्यादि विकार होकर उनके उपचार हेतु अनेक कोटि रुपये व्यय हो रहे हैं ।

२. हिन्दू राष्ट्रकी न्यायप्रणाली : सूक्ष्मके ज्ञानी सर्वत्र होनेके कारण न्यायालयमें प्रकरण (दावा) आते ही उसका निर्णय दिया जाएगा; अतः अधिवक्ता (वकील) नहीं होंगे ! हिन्दू राष्ट्रमें सभीसे साधना करवाई जाएगी; इसलिए भविष्यमें अपराध होंगे ही नहीं ! – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था (१.५.२०१५)



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