श्री गुरु उवाच
हमारे श्रीगुरुके मार्गदर्शनमें अभी तक 40 साधक संत पदपर विराजमान हो चुके हैं जो कि विश्वके इतिहासमें एक अद्वितीय घटना है |यह सत्य है कि सर्वोच्च स्तरके अर्थात परात्पर पदके संत अनेक साधक जीवका उद्धार करनेमें सक्षम है, इतिहास साक्षी है कि अनेक परात्पर पदपर आसीन संतोंने अनेक संत-शिष्य संसारको दिये भी परंतु हमारे श्रीगुरुने संत किसे कहते हैं , संतको कैसे पहचाने , संतोंकी प्रगति आगे आगे हो रही है या नहीं इन सबकेके बारेमें एक नयी आध्यात्मिक पद्धतिका प्रतिपादन कर धर्म क्षेत्रमें एक इतिहास रचा है और इन तथ्योंका आधार सूक्ष्म अतींद्रियाँ और जीवात्माओंको मिलनेवाले अनुभूतियां हैं|
हमारे श्रीगुरुके प्रत्येक सुवचनपर मैं अपने सहश्रों जन्म उनके कार्य निमित्त अर्पित करूँ तो वह भी अल्प ही होगा, उसका एक उदाहरण यहां प्रस्तुत कर रही हूं , यद्यपि इस लेखसे यह तो स्पष्ट है इसमें उनका कोई दोष नहीं , 70 प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर साध्य कर संतपद पर आसीन होनेके पश्चात भी संतोंने अपनी साधनामें वही सातत्य, वही गंभीरता एवं सधानामें उत्तरोत्तर प्रगति हेतु प्रयासमें निरंतरता बनाए रखना यह उनसे उनके गुरु एवं ईश्वरकी अपेक्षा होती है परंतु कुछ संतोंने अपनी साधना हेतु ये आवश्यक प्रयास नहीं किए इस हेतु वे स्वयं अपनेको उत्तरदायी मानने लगे और क्षमा मांगी , इस सुवचनमें उनकी इस विनम्रताकी पराकाष्ठा स्पष्ट दिखाई देती है |
मुझे यह कहनेमें तनिक भी संकोच नहीं कि उनकी बताई हुई योगमार्ग , उनके द्वारा प्रतिपादित सूक्ष्म संबन्धित तत्त्वज्ञान आनेवाले अनंत कालके लिए साधकोंका मार्गदशन करेंगी -“सनातन संस्थामें आये प्रत्येक व्यक्तिके अध्यात्मिक उन्नतिपर ध्यान दिया जाता है।
साधककी उन्नति ४०,५०,६०,और अंतमे ७० प्रतिशत तक होनेतक अर्थात संत होने तक उसे मार्गदर्शन दिया जाता है। संत होनेपर भी मार्गदर्शन आवश्यक है यह मुझे ध्यानमें नहीं आया क्योंकि अब तक तन,मन,धनका त्याग हो जानेसे एवं साधनामें गति आनेसे संत ७०,८०,९० और फिर १०० प्रतिशत तक स्वप्रयत्नोंसे पहुँचते हैं। वैसे भी संतोंको किसीने मार्गदर्शन किया हो यह कभी सुना नहीं था।
प्रत्यक्ष संत होकर ३-४ वर्ष बीत जानेपरभी सनातनके अधिकतर संत ७०,७२ तक ही रहे। कुछ १-२ प्रतिशतसे कम हो गये। तब मेरी समझमें आया कि जिस प्रकार ७० प्रतिशत तक मार्गदर्शन किया जाता है उसी तरह आगे भी मार्गदर्शनमें निरंतरता बनाए रखना होगा। यह समझमे आते ही मैंने संतोंसे क्षमा मांगी एवं सभी संतोंका
मार्गदर्शन पुनः शुरू किया जिससे उन्होंने अब पुनः प्रगति प्रारम्भ कर दी
है।”
– प.पू. डॉ. जयंत आठवले (५.११.२०१३) सनातन प्रभात १४. ११. २०१३
Leave a Reply