यह सूत्र निम्न विवेचनसे ज्ञात होगा –
किसी भी कार्यके कार्यान्वित होनेके पांच स्तर होते हें । विषय समझने हेतु हम भक्तिमार्गका उदाहरण लेंगे ।
प्रथम स्तर – इच्छित हाकार्य पूर्ण होने हेतु पूजा-पाठ, अनुष्ठान, तीर्थक्षेत्र जाना इत्यादि रूपी साधना करना ।
द्वितीय स्तर – प्रत्यक्ष पूजा पाठ न करते हुए मानस पूजा करना ।
तृतीय स्तर – मानस पूजाके स्थानपर नामजप करना ।
चतुर्थ स्तर – संकल्प करना । सम्पूर्ण विश्वकी ही नहीं अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति ईश्वरके एकोऽहम् । बहुस्याम् । अर्थात मैं एक हूं तथापि अनेकोंमें परिणित होऊंगा, इस संकल्पद्वारा हुआ है । ईश्वरने एक-एक पत्थर लेकर ब्रह्माण्डकी रचना नहीं की ।
पंचम स्तर – अस्तित्वसे कार्य सम्पन्न होना । यहां प्रत्यक्ष कार्य नहीं करना पडता । जैसे सूर्य उदय होनेपर सबसे यह नहीं कहता कि मैं आया, उठो । उसके अस्तित्व मात्रसे ही मनुष्य ही नहीं, अपितु पशु, पक्षी, प्राणी सभी उठ जाते हैं । बुद्धि प्रामाण्यवादियोंको पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, मन एवं बुद्धिसे केवल प्रथम स्तरका अल्प प्रमाणमें ज्ञान होता है । दूसरेसे पांचवें स्तरतकका कार्य बुद्धिसे परे होता है । इसीको अध्यात्म कहते हैं । बुद्धिलय होकर विश्व बुद्धिसे एकरूप होनेपर इन स्तरके कार्योंका कार्यकारण भाव ज्ञात होता है ।
इस हेतु साधना करना आवश्यक है । द्वितीयसे पंचम स्तर ही नहीं, ऐसा सोचनेवालों एवं यही अन्योंको सिखाने वालोंकी भी अपरिमित हानि होती है । यही होता रहा तो मानव पुनः अशिक्षित, निरक्षर एवं जंगली हो जाएगा ।
बुद्धि प्रामाण्यवादियों एवं उनकी मान्यताओंको माननेवालोंकी होनेवाली अपरिमित हानि
किसी विषयपर बिना अभ्यासके बोलना, यह मूर्खताका लक्षण है । अध्यात्मका अभ्यास किए बिना ही बुद्धि प्रामाण्यवादी उस विषयपर बोलते हैं, तो उनकी एवं उनको सुननेवालोंकी चिन्ता होती है; क्योंकि उनकी निम्न प्रकारसे हानि होती है ।
व्यष्टि जीवन
अ. उनके ज्ञानमें वृद्धि नहीं होती ।
आ. अहं बढ जाता है ।
समष्टि जीवन
अ. जिन्हें वे तत्त्व ज्ञान सिखाते हैं, वे भी उन्हींके समान अल्प ज्ञानी होते हैं ।
आ. अन्य लोगोंको अल्प ज्ञानी बनानेके कारण उनके समष्टि पापमें वृद्धि होती है ।
– परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
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