हिन्दुओंके लिए सर्वसमावेशक एकताकी आवश्यकता :
१. ‘भारतमें आज हिन्दू बहुसंख्य हैं; किंतु जात, दल, संप्रदाय, प्रांत, भाषा, इत्यादि पृथक घटकोंमें हिन्दुओंके इस सामर्थ्यका बंटवारा हुआ है । हिन्दुओंकी संघशक्तिके इस ह्रासके कारण ही अन्य धर्मीय अल्पसंख्यक होकर भी हिन्दू धर्म एवं समाजपर पृथक प्रकारसे (उदा. लव जिहाद, धार्मिक हिंसा, हिन्दुत्वनिष्ठोंकी हत्या, धर्मांतरण इत्यादि) अत्याचार करते हैं, साथ ही शासनद्वारा भी हिन्दुओंके साथ दूसरी श्रेणी(दर्जा) जैसा व्यवहार किया जाता है । इन सभी समस्याओंपर उपाय अर्थात् ‘हिन्दुओंको जात, दल, संप्रदाय, प्रांत, भाषा इत्यादिका विस्मरण कर एक ‘हिन्दू’के रूपमें एकत्रित आना चाहिए ।’
२. हिन्दुओंकी संघशक्तिका लाभ
अ. दंडशक्ति : आंदोलन, मार्ग बंद, मोर्चा, इस प्रकार कुछ कृत्य करनेके पश्चात् ही, अर्थात् दंडशक्तिका प्रदर्शन करनेके पश्चात् ही, ये राजनेता जनताकी समस्याका निराकरण करनेके प्रयास करते हैं । जिनको जो भाषा ज्ञात होती है, उसके साथ उसी भाषाका उपयोग करना चाहिए । यदि हिन्दू संगठनका एकत्रीकरण किया गया, तो ही दंडशक्ति निर्माण होगी । इससे राजनेताओंको हिन्दुओंकी एकताकी ओर ध्यान देने हेतु बाध्य होना होगा । साथ ही जात, दल, संप्रदाय, प्रांत, भाषा इत्यादिका विस्मरण कर यदि हिन्दू इकट्ठे हुए, तो ही अन्य धर्मियोंको भी उनके प्रति भय उत्पन्न होगा ।
आ. हिन्दू मतपेटी : मुसलमानोंके पास एकजुट मतपेटी होनेके कारण सर्वदलके राजनेता उन्हें संतुष्ट करने के प्रयास करते हैं । हज यात्राको अनुदान, सच्चर आयोगकी कार्यान्विति, मदरसोंके लिए विशेष अनुदान, ये सर्व मुसलमानोंके एकजुट मतोंके फलस्वरूप हैं । हिन्दुओंके जात, दल, संप्रदाय, प्रांत, भाषा, इस प्रकार विभिन्न गुटमें बंटवारा होनेके कारण उनके मत भी बंट गए हैं । यदि हिन्दू इकट्ठे हुए, तो ही हिन्दुओंकी मतपेटी सिद्ध होगी तथा हिन्दुओंके एकगुट मत प्राप्त करनेके लिए ही सही; किंतु राजनीतिक दलोंको हिन्दूहितका विचार करनेको बाध्य होना होगा ।’- परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले