श्रीगुरु उवाच


विज्ञानका अधिकाधिक उपयोग मानवको सुखी करनेके लिए किया गया जैसे – दूरदर्शन, भ्रमणभाष, यात्रा हेतु भिन्न साधन इत्यादि | फलस्वरूप मनुष्य सुखमें अधिकाधिक लिप्त होता चला गया | सुखका त्याग करनेपर ही चिरंतन आनंदकी प्राप्ति होती है, इसका विस्मरण होनेके कारण नैतिकता, विवेक, परोपकार, त्याग इत्यादि गुणोंका अवमूल्यन होनेके कारण वह दुखोंके रसातलमें डूब गया | इसपर उपाय एक ही और वह है मानवकों साधनाकी ओर पुनः प्रवृत्त करना | हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनाके पश्चात प्रत्येकसे साधना करवाकर लिया जाएगा | -परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले १९.८.२०१२)

 



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