श्रीगुरु उवाच


सीखनेसे नहीं अपितु सेवा परिपूर्ण एवं भावपूर्ण करनेके कारण आनंद प्राप्त होता है !

सीखनेमें आनंद नहीं होता है | वह बौद्धिक सुख होता है | सेवा परिपूर्ण एवं भावपूर्ण करनेके कारण आनंद मिलता है | अतः मुझे नवीन कुछ सीखने हेतु नहीं मिला यह दुख करनेकी अपेक्षा, मुझे मिली सेवा मैं परिपूर्ण एवं भावपूर्ण करता हूं क्या, इस बिन्दुपर साधकने ध्यान देना चाहिए |

– परात्पर गुरु डॉ जयंत आठवले

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भावार्थ : सुखकी अनुभूति मन एवं बुद्धिको होती है और वह वस्तु सापेक्ष होता है, आनंद जीवात्माको होती है और वह वस्तु, काल, स्थान निरपेक्ष होता है | हमें जो भी सेवा दी जाती है उसे यदि परिपूर्ण और भावपूर्ण करें तो आनंद मिलता है | सेवा परिपूर्ण करने हेतु उस सेवाके प्रति पूर्णरूपेण समर्पित होकर उसके सर्वपक्षके बारेमें विचार कर सेवा चूकविरहित, निर्धारित कालमर्यादामें सम्पन्न हो एवं संत, गुरु या ईश्वरको जैसे अपेक्षित है वैसा हो तो ही वह परिपूर्ण सेवा कहा जा सकता है  | सेवा भावपूर्ण तभी होगा जब सेवाके मध्य नामजप, प्रार्थना एवं कृतज्ञताका अखंड भाव समाहित होगा और ऐसा करनेसे सेवासे आनंद प्राप्त होता है, यदि सेवा भावपूर्ण न हो तो उससे कार्य होता है और उससे आनंद नहीं मिलता है |

सीखनेसे बौद्धिक सुख मिलता है जैसे जब वाहन चलाना सीखते हैं या संगणक (कम्प्युटर) तो सुखकी अनुभव होता है; परंतु उसे एक बार चलाना सीख लेनेपर उसी प्रमाणमें पुनः सुख नहीं अनुभव होता है | वस्तु सापेक्ष सुख बौद्धिक हो तो भी वह चिरस्थायी नहीं रहता और थोडे काल उपरांत उससे प्राप्त  होनेवाले सुखमें ह्रास होता है, जो सुख चिरस्थायी हो उसे ही आनंद कहते हैं और यह सेवासे ही प्राप्त होता है | – तनुजा



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