पूरे देश में १३६ वर्षोंसे सवा तीन कोटि परिवाद निर्णयकी प्रतीक्षामें हैं; इसलिए वाराणसीके न्यायालयमें वर्ष १८७८से प्रलंबित परिवाद हैं । ‘न्यायालयोंकी संख्यामें वृद्धि करनी चाहिए’, यह विचार एक भी सत्ताधारी राजनीतिक दलके मनमें क्यों नहीं आता ? ‘यदि न्यायालयमें निर्णय शीघ्रगति से प्राप्त हुए, तो हमें कारागृहमें जाना पडेगा’, क्या इस भयसे वे ऐसा करते हैं ?’ परात्पर गुरु परम पूज्य डॉ. जयंत आठवले(२.३.२०१५)