जब अभिलाषा एवं प्राणिमात्र की सहज प्रवृत्तियां, रुचि एवं अरुचि तथा स्वभाव संबंधी विशिष्टताएं आदि तीव्र संस्कार अवचेतन मस्तिष्कसे धुल जाते हैं, केवल तभी अज्ञानता नष्ट होकर चिरस्थायी आनंदका अनुभव किया जा सकता है । तीव्र संस्कार एवं अज्ञानता नष्ट करनेकी यह विधि आध्यात्मिक अभ्यास कहलाती है । -परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
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