श्रीगुरु उवाच


व्यक्तिस्वातंत्र्य अर्थात् स्वैराचार (अर्थात् स्वेच्छा) । इसके विपरीत स्वेच्छा नष्टकर परेच्छासे तथा आगे ईश्वरेच्छासे वर्तनकर मायाके बन्धनसे मुक्त होकर वास्तविक स्वतंत्रताका उपभोग होता है ।-  परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले



Comments are closed.

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution