व्यक्तिस्वातंत्र्य अर्थात् स्वैराचार (अर्थात् स्वेच्छा) । इसके विपरीत स्वेच्छा नष्टकर परेच्छासे तथा आगे ईश्वरेच्छासे वर्तनकर मायाके बन्धनसे मुक्त होकर वास्तविक स्वतंत्रताका उपभोग होता है ।- परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
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