श्रीगुरु उवाच


देखनेसे सुनना अधिक महत्त्वपूर्ण

देखना, तेज तत्त्वके स्तरपर होता है तो सुनना, आकाश तत्त्वके स्तरपर । किसी भी सुन्दर कलाकृति या व्यक्तिकी ओर अधिक समय तक देखना सम्भव नहीं होता इसका एक और कारण है कि विषय वही रहता है; परन्तु आकाश तत्त्वमें विविध विषयोंपर वार्तालाप सम्भव है, इसी कारण चित्र अथवा मूक चित्रपटोंसे आकाशवाणी अधिक लोकप्रिय है । पढकर सीखनेकी सीमा होती है, सुनकर सीखनेकी नहीं; अतः हमारे वेद, उपनिषद  इत्यादि पाठान्तरद्वारा सीखे जाते थे, पढकर नहीं; इससे दूसरेसे सुननेका महत्त्व समझमें आता है । देखना और सुनना एक साथ हो तो अधिक परिणामकारक होता है ।  उदाहरण चलचित्र एवं दूरदर्शन । इसी कारण आजकल देखना और सुनना, दृश्य-श्रव्य माध्यम अधिक उपयोग किए जाते हैं ।  –परात्परगुरु परम पूज्य डॉ. जयंत आठवले



Comments are closed.

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution