अध्यात्मप्रसार क्रियाशक्तिकी अपेक्षा ज्ञानशक्तिके कारण अधिक होता है !


 १९८६ से २००६ तकके इस कालखंडमें मैंने अध्यात्मशास्त्रीय व्याख्यान, अभ्यासवर्ग और सार्वजनिक सभाओंको लेने हेतु अधिकसे अधिक समय भ्रमण किया | वर्ष २००७ से प्राणशक्ति अत्यल्प होनेके  कारण मैं कहीं बाहर नहीं जा सका | पहले मुझे लगा कि अब मैं बाहर नहीं जा पाऊंगा तो धर्म प्रसार कैसे कर पाऊंगा ? मैं बाहर नहीं जा सकता था; अतः अधिकसे अधिक समय ग्रंथ लिखा करता था | वर्ष २०१३ में मुझे ध्यानमें आया कि मेरे बाहर जानेसे जितने साधक साधना करते उसके अनेक गुना अधिक, जग भरसे जिज्ञासु मेरेद्वारा संकलित किए गए ग्रन्थोंके माध्यमसे साधनाकी ओर अग्रसर होने लगे हैं | इससे यह पुनः सिद्ध होता है कि अध्यात्मप्रसार, सभी स्थानपर जानेसे अर्थात् क्रियाशक्तिसे जितना होता है, उसकी अपेक्षा अनेक गुना अधिक स्थल–कालकी मर्यादाकी सीमा तकर ग्रंथलेखनसे अर्थात् ज्ञानशक्तिसे होता है | संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत तुलसीदास इत्यादिद्वारा लिखित ग्रंथ सैकडों वर्षके पश्चात् भी अध्यात्मप्रसार वेद, उपनिषद् समान करते हैं | यह ग्रन्थोंद्वारा अध्यात्म प्रसार होनेके सर्वज्ञात उदाहरण हैं | – परात्पर गुरु परम पूज्य डॉ. जयंत आठवले | (माघ कृष्ण पक्ष चतुर्थी, कलियुग वर्ष ५११४ (१.३.२०१३)


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