सर्वधर्म समभाव’ यह किसी भी विचारकके विचारोंमें आना असम्भव है, क्योंकि सर्व धर्मोंकी शिक्षा समान नहीं है, उदा. –
अ. अन्य धर्मोंमें केवल स्वर्गलोकतकका उल्लेख है । उनके अनुसार स्वर्ग अर्थात् ‘मौजमस्ती’ करनेका, सुख ही सुख उपभोगका स्थान है ।
आ. ‘अपना ही धर्म सर्वश्रेष्ठ’ ऐसी अहंभावकी प्रवृत्ति अन्य धर्मोंमें है । इसके विरुद्ध ‘जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृति, उतने साधना मार्ग’, यह सीख हिन्दू धर्मकी है ।
इ. ‘केवल हमारे धर्मके माध्यमसे ईश्वरप्राप्ति हो सकती है’, ऐसा अन्य धर्मोंमें कहा जाता है, हिन्दू धर्ममें नहीं ।
ई. हिन्दू छोड कोई भी अन्य धर्मीय सर्वधर्म समभाव शब्द नहीं उच्चारते ।
हिन्दुओ ! कमसे कम अब तो धर्मका अभ्यास तथा साधना करके हिन्दू धर्मकी श्रेष्ठता अनुभव करो तथा ‘सर्वधर्म समभाव’ शब्द सदाके लिए गाड दो ! । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले