परात्पर गुरु डॉ. आठवलेका सन्देश ।


हिंदुओ, केवल वैचारिक तथा कृतिशील प्रसारमाध्यमोंके ही पाठक तथा दर्शक बनें !
नियतकालिकोंके पाठक तथा समाचार प्रणालोंके दर्शकोंको आवाहन – प.पू. डॉ. आठवले
‘श्री गणेशके विषयमें अपमानजनक समाचार प्रसारित करनेवाले हिंदूद्वेषी विचारक जैसे डॉ. जाकिर नाईक, म.फि, हुसैनके विषयमें समाचार सर्वप्रथम दैनिक ‘सनातन प्रभात’द्वारा दिए जानेके उपरांत गिने-चुने नियतकालिकोंद्वारा ही इसे प्रसिद्धी दी गई थी; परंतु एक भी समाचार प्रणालने इस विषयका वृत्त प्रसारित नहीं किया था । इससे यह सिद्ध होता है कि हिंदूबहुल भारतके प्रसारमाध्यम भी हिंदूद्वेषी हैं और उनकी दृष्टिमें हिंदुओंकी धर्मभावनाओंका कौडीभर भी मोल नहीं है । आदर्श तथा तत्त्वनिष्ठ पत्रकारिता वैâसी होनी चाहिए, इसकी विस्तृत जानकारी ‘सनातनकी पत्रकारिता’ नामक ग्रंथमें दी गई है । आज तत्त्वनिष्ठ पत्रकारिता तो दूर रही, आजकलके पत्रकार वस्तूनिष्ठ वार्तांकन न करते हुए हिंदुओंको अंधेरेमें रखनेका कार्य कर रहे हैं ।

पाठको, हिंदूद्वेषी प्रसारमाध्यमोंका ही बोलबाला होनेसे आपका दायित्व बढ गया है । आप नीचे दिए गए नियतकालिकोंके प्रकारमेंसे क्या पढते हैं, इसका अभ्यास करें । आपको अंधेरेमें रखनेवाले प्रसारमाध्यमोंको बहिष्कृत करके वैचारिक तथा कृतिशील करनेवाले नियतकालिकोंके पाठक बनें, उसी प्रकार तत्त्वहीन नियतकालिकोंके नाम दैनिक ‘सनातन प्रभात’के निकटतम कार्यालयमें सूचित करें ।’
नियतकालिकोंके प्रकार
१. आसुरी : ‘राष्ट्र एवं धर्मद्रोही वृत्तको दृष्टिकोण देना
२. मृतवत् : राष्ट्रद्रोही एवं धर्मद्रोही समाचार न छापना तथा छापनेपर अपराधियोंके धर्मका उल्लेख न करना तथा उसके कारण बताना ‘अपराधियोंका धर्म नहीं होता’, उदा. सर्वधर्मसमभावी
३. विचारशून्य : राष्ट्रद्रोही एवं धर्मद्रोही समाचार छापना; परंतु उसके संदर्भमें पाठकोंका प्रबोधन न करना
४. विचारी : राष्ट्रद्रोही एवं धर्मद्रोही समाचार छापकर उस संदर्भमें प्रबोधन करना
५. कृतिशील : राष्ट्रद्रोही एवं धर्मद्रोही समाचार छापकर उस संदर्भमें कृतिको प्रोत्साहित करना, उदा. सनातन प्रभात
भारतके बहुसंख्य हिंदू मृतवत्, विचारशून्य एवं आसुरी होनेसे उस वृत्तिके नियतकालिकोंके करोडों पाठक हैं । विचारी एवं कृतीशील हिंदू अल्पसंख्यक होनेसे उस वृत्तिके नियतकालिकोंके पाठक अल्प हैं और ‘सनातन प्रभात’ समान नियतकालिकोंके पाठक नगण्य हैं ।’
हिंदू राष्ट्रकी स्थापनाके लिए हमें यह स्थिति परिवर्तित करनी है । – परात्पर गुरु डॉ . जयंत आठवले

स्रोत: सनातन प्रभात (हिंदी)।



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