आठ वर्ष कहीं बाहर नहीं जा पानेके कारण परम पूज्य गुरुदेव डॉ. आठवलेको हुए लाभ !
पहले मैं सोचता था, वृक्ष, पर्वत, इत्यादि एक ही स्थानपर खडे होते हैं, इससे उन्हें ऊब (बोरियत) नहीं होती होगी क्या ? इसका उत्तर मुझे मेरी रुग्णावस्थामें मिला । मुझे लगता है, पिछले ८ वर्षोंमें मैं कहीं बाहर नहीं जा सका, तब भी केवल खिडकीसे दिखाई देनेवाले दृश्योंको देखकर भी मैं आनंदित हूं । इसपर विचार करते हुए समझमें आया कि खिडकीसे दिखाई देनेवाले दृश्योंको देखकर मैं आनंदित नहीं, केवल सुखी हो सकता हूं; क्योंकि बाहरसे केवल सुखकी प्राप्ति होती है । मैं साधना करता हूं, फलस्वरूप मुझे अंदरसे आनंदकी प्राप्ति होती है । मैं आनंदावस्थामें ही होता हूं । परिस्थितिसे परिवाद (शिकायत) न करते हुए स्थितिको स्वीकारकर आनंदित कैसे रहना, यह मैं इस कालमें सीखा हूं । बाहर न जा सकनेसे एक और लाभ हुआ, वह यह कि इधर-उधर न जानेसे समयका अपव्यय नहीं होता इसलिए मैं ग्रंथलेखनपर ध्यान केन्द्रित कर सकता हूं, इससे मुझे एवं समष्टिको भी आनंद मिलता है।- परम पूज्य डॉ. जयंत आठवले (२.१०.२०१४)