व्यासपीठको ‘व्यासपीठ’ कहते हैं क्योंकि उसपर खरा अधिकार महर्षि व्यासका है | ‘व्यासोच्छिष्टं जगत् सर्वम् ।’ जिसका अर्थ है जगतके सर्व अध्यात्मविषयक ज्ञान महर्षि व्यासके उच्छिष्ट (जूठन) है इस प्रकारकी लोकोक्ति दृढ हुई है | जब हम उसपर जाते है तो उनके प्रति कृतज्ञता स्वरूप अपने पादत्राण (चप्पल) उतार कर जाते हैं |
वर्तमान समयमें सर्व तथ्योंमें पश्चत्योंका अनुकरण करनेवाले बुद्धिवादी ( खरे अर्थोंमें अज्ञानवादी) पश्चात गिरिजाघरमें जूते पहन कर जाते हैं, यह उदाहरण देते हैं | उन्हें यह ज्ञात नहीं कि पाश्चात्योंको चैतन्य यह शब्द ही ज्ञात नहीं है ! – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले
संदर्भ – मराठी दैनिक सनातन प्रभात
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