श्रीगुरु उवाच


तथाकथित बुद्धिप्रामाण्यवादियोंको विज्ञानमें नये शोध करनेकी अनुमति है; परन्तु अध्यात्ममें नये शोधकी अनुमति नहीं !

सत्य, त्रेता एवं द्वापर युगोंमें अल्प शब्दोंमें ही तथ्योंका बताना पर्याप्त था; क्योंकि तबके मानवकी बुद्धि कलियुगीन मानवकी बुद्धिसे श्रेष्ठ थी एवं मानवोंमें श्रद्धा थी । कलियुगमें बौद्धिक क्षमता एवं श्रद्धा अल्प होनेसे अध्यात्म सविस्तार समझाना पडता है; परन्तु उसीपर कांग्रेस सरकारने वैधानिक रूपसे रोक लगाई है । जो धर्मग्रंथमें दिया है उतना ही सत्य है, उससे भिन्न नूतन तथ्य कोई बताए तो उसे धर्मग्रंथका आधार नहीं एवं इस प्रकार जो भी बताता है वह दण्डका पात्र है यह कांग्रेस सरकारका विधान (कानून) कहता है । यथार्थमें ईश्वरसे दूर ले जानेवाले बुद्धिप्रामाण्यवादियों हेतु यह विधान होना चाहिए । जिससे कि वैज्ञानिक मायाके संशोधनोमें स्वयंका एवं समाजका समय व्यर्थ न गंवाते हुए, साधनाको समय दे सकेंगे ।-(परात्पर गुरु) डॉ जयंत आठवले(७.११.२०१३)

(यहांपर श्रीगुरु महाराष्ट्रमें कांग्रेस सरकारद्वारा अंधश्रद्धा निर्मूलन विधेयकको विधानके (कानून) रूपमें दिए गए मान्यताके फलस्वरूप सनातन संस्थाके आध्यात्मिक शोधको हो रहे विरोधके विषयमें बता रहे हैं !)-तनुजा ठाकुर



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