परित्यज्येयं त्रैलोक्यं राज्यं देवेषु वा पुनः। यद्धाप्याधिकमेताभ्यां न तु सत्यं कथंचन।। – महाभारत, आदिपर्वः (१०३: १५)
अर्थ : “मैं तीनों लोकों का राज्य, देवताओंका साम्राज्य अथवा इन दोनोंसे भी अधिक महत्त्वकी वस्तुको भी पूर्णत: त्याग सकता हूं, परन्तु सत्यको किसी प्रकार नहीं छोड सकता।”
Leave a Reply