भोपालके समारोहमें प्रवक्ताओंके ‘सिन्दूर’ और तुलसीकी महानता बतानेपर वैज्ञानिकोंमें रोष, कहा ये बातें निराधार !


जनवरी ७, २०१९

 

‘सिंदूर रक्तचापको सन्तुलित करनेमें सहायता करता है और तुलसीके पौधेके पास रहनेसे शीतलता बनी रहती है ।’ इसप्रकारके विचित्र दावे बुधवारको ‘एनसीइआरटी’द्वारा संचालित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थानमें ‘विद्यालय विज्ञानमें उभरते रुझान और नवाचार’पर आयोजित एक कॉन्फ्रेंसमें किए गए । इस व्याख्यानमें किए गए दावोंके पश्चात वैज्ञानिक विरोधमें हैं ।
इस व्याख्यानमें एक प्रवक्ताने कहा कि सिंदूर लगानेसे रक्तचाप नियन्त्रित रहता है । एक अन्य प्रवक्ताने कहा कि ‘नमस्ते’ करनेसे रोग दूर रहते हैं । यद्यपि, वहां बैठे श्रोताओंको प्रवक्ताओंकी बातोंपर विश्वास नहीं हो रहा था ।

वैज्ञानिकोंने कहा कि ऐसे किसी भी सम्मेलनमें कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होने चाहिए । अनुसंधान विद्वान और वैज्ञानिक गुरुवारको ‘आरआईई’में सम्मेलन स्थलपर इसके विरोधमें प्रदर्शन करेंगे ।

कई वैज्ञानिकोंने कहा कि इसप्रकारकी बातोंको अनुमति नहीं दी जानी चाहिए । उन्होंने ‘आरआईई’को चेतावनी भी दी । भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान कोलकाताके प्रोफेसर सौमित्रो बनर्जीने कहा, ‘हमने ‘आरआईई’के अध्यक्ष, एन. प्रधानको ‘ई-मेल’ भेजा है । हमने लिखा है कि इसस्रकारके भ्रामक शोधपत्रोंको एकत्र करनेकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए । यह अचम्भित करनेवाली बात है कि ऐसे शोधपत्रोंको रोकनेके स्थानपर, आयोजकोंने कई विषयोंपर चर्चा की, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है ।’


‘होमी भाभा सेंटर फॉर साइंस एजुकेशन’के डॉ. अंकित सुलेने भी चर्चाके लिए चुने गए कई ऐसे विषयोंपर आपत्ति प्रकट की । उन्होंने कहा, “ प्रथम दिवस समारोहमें दो समानान्तर सत्र रखे गए थे । विषय था, आजके परिप्रेक्ष्यमें प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान । जो भी लोग इन सत्रोंमें उपस्थित थे, उन्होंने यह अधिसूचना दी कि कई वक्ताओंने जो दावे किए, वे संदिग्ध दावे किए । वे सन्देह वाले थे ।’

जब इसपर अध्यक्ष एन प्रधानसे सम्पर्क किया गया, तो उन्होंने कहा कि वह एक वैज्ञानिक नहीं हैं और वह समारोहमें प्रस्तुत किए गए शोधपत्रोंपर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते है ।

 

“सिंदूर लगानेसे महिलाओंपर कवचका निर्माण होता है, विषाणुओंसे बचाव होता है, तुलसीके पौधेसे निकलनेवाली सात्विक तरंगें वास्तु शुद्धि व शीतलताका कार्य करती है, यह न केवल शास्त्र, वरन आजका रंगोंका औषधीय विज्ञान बताता है, जिसमें रोगियोंको भिन्न रंगोंके माध्यमसे भिन्न रोगोंका उपचार किया जाता है और तुलसीकी महानता तो ‘नासा’तक मानता है, यूंहि कोई ‘पेटेंट’ क्यों करवाना चाहेगा ? डॉ भाभा आध्यात्मकी शक्तिके बलपर इतना बृहद कार्य कर गए; आध्यात्मको नकारनेवाले स्वयंसे पूछे कि बिना आध्यात्मके क्या प्राप्त किया है ?”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ

स्रोत : अमर उजाला



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