सितम्बर २१, २०१८
कभी भारतके सशक्त किलोंमें से गिने जाने वाले भटनेर किलेने कई आक्रमण सहन किए और राजाओंके राजपाट देखे, परन्तु रखरखावके नामपर हो रहे भ्रष्टाचारके आक्रमणको यह किला सहन नहीं कर पाया और रखरखावके आभावमें किला जर्जर होकर गिरनेकी स्थितिमें है ! ५२ बीघा क्षेत्रमें ५२ बुर्जियों सहित निर्मित भटनेर किलेकी एक बुर्जी वर्षाके कारण गिरनेके साथ इसकी भीतरकी स्थिति भी ठीक नहीं है ।
मुख्य द्वार तक ढहनेकी स्थितिमें है, जिसके चलते द्वारको लोहे कि पाईपोंके सहारे खडा कर रखा है । किलेके आसपासके लोगोंमें भी भय है कि कभी भी इसकी भित्ति गिर सकती है और कोई बडी दुर्घटना हो सकती है ! इसमें आने वाले लोगोंको भी भय है और बाहर बसी बस्तियोंके लोग भी भयभीत हैं कि किलेकी भित्ति उनके घरोंपर ना आ गिरें !
ख्रिस्त्राब्द १८०५ में बीकानेरके राजा सूरत सिंहने यह किला भाटियोंसे जीता था और उस दिन मंगलवार होनेके कारण इसका नाम हनुमानजीके नामपर हनुमानगढ रखा गया था । इस किलेके बारेमें तैमुरने अपनी जीवनी ‘तुजुके तैमुर’में इसे हिन्दुस्ता का सबसे सशक्त किला कहा था, क्योंकि रक्षक ही स्थानपर खडा रहकर तीन स्थानोंपर युद्ध कर सकता है । किलेके जर्जर होकर गिरनेके पीछे बडा कारण भ्रष्टाचार बताया जा रहा है । इस किलेके रखरखावके नाम पर शासनने कोट्यावधि रुपये व्यय किए, परन्तु वास्तवमें ये व्यय केवल पत्रोंमें ही सीमित रह गया । बुर्जी गिरनेकी सूचना मिलनेपर पुरातत्व विभागके अधिकारीयोंने भी वहां पहुंचकर निरीक्षण किया था और स्तिथिको गम्भीर पाया था; लेकिन इसके जीर्णोधारके लिए कुछ नहीं किया गया !
“यह है हिन्दुओंकी स्थिति ! न ही स्वयंकी संस्कृतिका रक्षण कर पाएं, न ही संस्कारोंका । न पूर्वजोंके मूल्योंका और न ही प्रदत्त धरोहरोंका !” – सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जी न्यूज
Leave a Reply