कल हमने तुलसीके विषयमें व इससे होनेवाले कुछ लाभके विषयोंमें बताया था । आज आपको तुलसीके कुछ अन्य लाभ व सावधानियोंके विषयमें बताएंगें –
* श्वास रोगमें – श्वास सम्बन्धी रोगोंका उपचार करनेमें तुलसीका सेवन उपयोगी सिद्ध होता है । मधु (शहद), अदरक और तुलसीको मिलाकर बनाया गया काढा पीनेसे श्वसन-शोथ (ब्रोंकाइटिस), ‘दमा’ और कफमें लाभ मिलता है । नमक, लौंग और तुलसीके पत्तोंसे बनाया गया काढा ‘इंफ्लुएंजा’में (एक प्रकारका ज्वर) तुरन्त लाभ देता है ।
* पथरी – तुलसी वृक्कको (गुर्देके) सशक्त बनाती है । मधुमें (शहदमें) मिलाकर तुलसीके अर्कका नियमित सेवन करना चाहिए, इससे छह माहमें लाभ दिखेगा ।
* हृदय रोग : तुलसी रक्तमें रक्तवसाके (कोलेस्ट्रालके) स्तरको न्यून करती है । ऐसेमें हृदय रोगियोंके लिए यह लाभप्रद सिद्ध होती है ।
* तनाव : तुलसीकी पत्तियोंमें तनावरोधी गुण भी पाए जाते हैं । तनावको दूर रखनेके लिए कोई भी व्यक्ति तुलसीके १२ पत्तोंका प्रतिदिन दो बार सेवन कर सकता है ।
* मुखका संक्रमण – अल्सर और मुखके अन्य संक्रमणमें तुलसीकी पत्तियां लाभप्रद सिद्ध होती हैं । प्रतिदिन तुलसीकी कुछ पत्तियोंको मुखमें रखकर चूसनेसे मुखका संक्रमण दूर हो जाता है ।
* त्वचा रोग – मण्डलकुष्ठ (दाद), खुजली और त्वचाके अन्य रोगोंमें तुलसीके अर्कको प्रभावित स्थानपर लगानेसे कुछ ही दिनोंमें रोग दूर हो जाता है । प्राकृतिक चिकित्साद्वारा श्वेत कुष्ठकी (ल्यूकोडर्माकी) चिकित्सा करनेमें तुलसीके पत्तोंको सफलता पूर्वक प्रयोग किया गया है । तुलसीकी ताजा पत्तियोंको संक्रमित त्वचापर रगडें, इससे संक्रमण अधिक नहीं फैल पाता ।
* श्वासकी दुर्गन्ध – तुलसीकी सूखी पत्तियोंको सरसोंके तेलमें मिलाकर दांत स्वच्छ करनेसे श्वासकी दुर्गन्ध चली जाती है । ‘पायरिया’ जैसे रोगमें भी यह प्रयोग लाभप्रद सिद्ध होता है ।
* सिरमें वेदना – सिरकी वेदनामें तुलसी एक उत्तम औषधिके रूपमें कार्य करती है । तुलसीका काढा पीनेसे सिरकी वेदनामें लाभ मिलता है ।
* नेत्र रोग – नेत्रोंकी जलनमें तुलसीका अर्क अत्यधिक लाभप्रद सिद्ध होता है । रात्रिमें प्रतिदिन ‘श्यामा तुलसी’के अर्ककी दो बूंदें नेत्रोंमें डालनी चाहिए ।
* कानमें वेदना – तुलसीके पत्तोंको सरसोंके तेलमें भून लें और लहसुनका रस मिलाकर कानमें डाल लें, इससे वेदनामें लाभ मिलेगा ।
* रक्तचाप – रक्तचापको (ब्लड-प्रेशरको) सामान्य रखनेके लिए तुलसीके पत्तोंका सेवन करना चाहिए ।
* वमन – वमनकी स्थितिमें तुलसी पत्र मधुके साथ प्रातःकाल व जब आवश्यकता हो तब पिलाते हैं । पाचन शक्ति वृद्धिके लिए, अपच रोगोंके लिए तथा बालकोंके यकृत व प्लीहा सम्बन्धी रोगोंके लिए तुलसीके पत्तोंका क्वाथ (काढा) पिलाते हैं । छोटी इलायची, अदरकका रस व तुलसीके पत्तेका स्वरस मिलाकर देनेपर वमनकी स्थितिको शान्तकर सकते हैं ।
* बवासीरमें – तुलसीके बीजोंका चूर्ण दहीके साथ लेनेसे बवासीरमें रक्त आना बंद हो जाता है ।
* प्रातःकाल २-३ चम्मच तुलसीके रसका सेवन करें तो शारीरिक बल एवं स्मरण शक्तिमें वृद्धिके साथ-साथ आपका व्यक्तित्व भी प्रभावशाली होगा ।
* भार नियन्त्रणमें – शरीरके भारको (वजनको) नियन्त्रित रखने हेतु तुलसी अत्यन्त गुणकारी है । इसके नियमित सेवनसे भारी व्यक्तिका भार न्यून होता है एवं पतले व्यक्तिका भार बढता है अर्थात तुलसी शरीरका भार आनुपातिक रूपसे नियन्त्रित करता है ।
* विषैले जीवके काटनेपर – विषैले जीव सांप, ततैया, बिच्छूके काटनेपर तुलसी पत्तोंका रस उस स्थानपर लगानेसे लाभ मिलता है । तुलसीका रस शरीरपर मलकर सोयें, इससे मच्छरोंसे छुटकारा मिलेगा । तुलसीका रस मलेरियाके मच्छरका शत्रु है । तुलसीके बीज खानेसे विषका प्रभाव नहीं होता है ।
* तुलसीका पौधा मलेरियाके कीटाणु नष्ट करता है । शोधसे ज्ञात हुआ है कि इसमें ‘कीनोल’, ‘एस्कार्बिक अम्ल, ‘केरोटिन’ और ‘एल्केलाइड’ होते हैं । तुलसी पत्र मिला हुआ जल पीनेसे कई रोग दूर हो जाते हैं, इसीलिए चरणामृतमें तुलसीके पत्ते डाले जाते हैं । तुलसीके स्पर्शसे भी रोग दूर होते हैं ।
सावधानियां –
१. विश्व स्वास्थ्य संगठनके अनुसार, जो लोग ‘एसिटामिनोफेन’की औषधि खा रहें हैं, जो शरीरमें ‘ग्लूटाथियोन’के स्तरको न्यून करती है, उनके लिए प्रतिदिन तुलसी खाना हानिकारक हो सकता है, क्योंकि यह शारीरिक वेदनाकी औषधि है और यही कार्य तुलसी भी करती है, यदि दोनों साथमें खाई जाएं तो इससे यकृतको (लिवरको) हानि हो सकती है; अतः यदि आप ‘एसिटामिनोफेन’ औषधि ले रहे हैं तो चिकित्सकके परामर्शसे ही तुलसी लें ।
२. तुलसी खानेसे रक्त पतला होता है, यदि पहलेसे रक्तको पतला करनेकी कोई औषधि खा रहें हैं तो यह हानि कर सकती है ।
३. अधिक मात्रामें तुलसीके सेवनसे पुरुषोंमें शुक्राणुकी संख्या न्यून हो जाती है; इसीलिए पुरुषोंको सीमित मात्रामें प्रयोग करना चाहिए ।
४. यदि पहलेसे मधुमेहके स्तरको न्यून करनेकी औषधि ले रहे हैं तो तुलसीका सेवन चिकित्सीय परामर्शसे ही करना चाहिए ।
५. तुलसीके पत्तोंको दांतोंसे चबाना टालना चाहिए ।
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