ईशनिन्दा विधानकी याचना, ‘यूनिफार्म सिविल कोड’का विरोध, भारतमें हिन्दू बन रहे धर्मनिरपेक्ष, ‘शरिया’के पक्षमें मुसलमान
२५ नवम्बर, २०२१
शुक्रवार २२ नवम्बर २०२१ को इलाहाबाद उच्च न्यायालयने अन्तरधार्मिक जनहित याचिकाओंपर विचार करते हुए केन्द्र शासनको निर्देश दिया है कि समूचे देशमें समान नागरिक संहिता क्रियान्वित करे ! इसी वर्ष जुलाई माहमें देहली उच्च न्यायालयने भी शासनको यही करनेका दिशा-निर्देश प्रकाशित किया था । इससे पूर्व २०१९ में सर्वोच्च न्यायालयके एक पीठने समान नागरिक संहिता न लानेपर केन्द्र शासनको उत्तरदायी ठहराया था ।
‘ऑल इण्डिया मुस्लिम लॉ बोर्ड’के एक सम्मेलनके समापनके समय आए प्रस्तावमें समान नागरिक संहिताको तो मना कर दिया था । वहीं ‘ईशनिन्दा विधान’ क्रियान्वित करनेकी बात की । उनका मत है कि सामाजिक जालस्थानोंपर मोहम्मद साहबके विरुद्ध लिखे जानेपर वैधानिक कार्यवाही हो ।
उल्लेखनीय है कि ईरान, नाइजीरिया, पाकिस्तान, सोमालिया, सऊदी अरब जैसे मुसलमान देशोंमें इस विधानके अन्तर्गत, अर्थदण्डसे लेकर मृत्युदण्डतकका प्रावधान है । इसका दण्ड वहांके अल्पसङ्ख्यक असत्य आरोप लगनेपर भोगते हैं ।
सर्वोच्च न्यायालयने कहा है कि हिन्दू अधिनियम १९५६ पारित होनेके बादसे आजतक, समान नागरिक संहिताकी दिशामें कोई पग नहीं उठाया गया । अचरज यह कि ‘मुस्लिम लॉ बोर्ड’ जो इसे अनावश्यक बताता है, वह मात्र मुसलमानोंकी आस्थापर ईशनिन्दा विधानकी याचना करता है, अन्य धर्मियों हेतु नहीं !
यह एकमात्र हिन्दू बहुल देश है । यहां ‘मुस्लिम लॉ बोर्ड’की स्थापना ही तत्कालीन प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधीकी चूक थी । हमारी आस्था नित्य चोटिल होती है । अनेक मुसलमान बहुल क्षेत्रोंमें हमारे मन्दिर भी सुरक्षित नहीं । हमें अपने धर्मकी रक्षा हेतु किसी कठोर विधानकी आवश्यकता है । समान नागरिक संहिता भी शीघ्र क्रियान्वित होनी चाहिए, जिससे धार्मिक आधारपर दिए जानेवाले अनावश्यक प्रावधान बन्द हों । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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