वर्ण और जातिमें क्या भेद है ?, यह आजके सामान्य हिन्दुओंको ज्ञात नहीं, इससे ही समझमें आता है कि निधर्मी लोकतन्त्रने धर्मशिक्षणसे दूर कर, हिन्दुओंकी कितनी दुर्गति कर दी है ! वर्ण गुण-कर्म आधारित होता है और हमारी वैदिक संस्कृति सदैव ही वर्ण आधारित रही है और इसकी पुनर्स्थापना यदि शीघ्र नहीं की गई तो यह देश रहने योग्य नहीं रहेगा !
Leave a Reply