कुछ दिवस पूर्व इटलीके कुछ गौशालाओंमें जानेकी सन्धि मिली, वहां जानेपर ज्ञात हुआ कि बछडेके जन्मके पश्चात उसे अपनी मांसे कभी नहीं मिलने दिया जाता है, उन्हें सूखे दुग्धचूर्णमें (मिल्क पाउडर ) पानी मिलाकर पीने दिया जाता है । विदेशियोंके लिए गाय, दूध देनेवाला एक पशु मात्र है और हम हिन्दुओंके लिए गाय देवतुल्य माता है, जिनके उदरमें सर्व देवताओंका वास है ।
इतना ही नहीं, वहां नवजात, यदि बछडा हो तो उसे मांस या चर्म (चमडे) हेतु पशुवध गृह भेज दिया जाता है । यह सब क्रूरता जाननेके पश्चात ही अनेक विदेशी अब मांसके साथ ही दूध भी त्यागने लगे हैं । साथ ही, वहां मांस उद्योगसे बचे हुए एवं मनुष्यके लिए अनुपयोगी अवशेष, गायके आहारकी पौष्टिकता हेतु डाले जाते हैं । एक भारतीय, जो वहां चाकरी करते थे, उन्होंने मुझे उस आहारमें सम्मिलित सामग्रीकी सूची पढाई तो मैं भी आश्चर्यचकित रह गई ! वे दूधकी डेयरीमें कार्य करते थे; किन्तु दूधका सेवन नहीं करते थे एवं मुझसे पूछ रहे थे कि जातिसे ब्राह्मण हूं; किन्तु अपने हाथोंसे बछडेको पशुवधगृह ले जानेवाले वाहनमें नित्य चढाता हूं, क्या उनके इस पापका कोई प्रायश्चित हो सकता है ? (२३.७.२०१३)
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