क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकते मौक्तिकानां
मालाकॢप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः।
शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूष वर्षैः
आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदा शङ्खपाणिर्मुकुन्दः।।
अर्थ : भक्तोंको मोक्ष प्रदान करनेवाले उन शेषशायी विष्णुको नमन कर उन्हें हमें पवित्र करने हेतु प्रार्थना करते हैं जो क्षीरसागरमें जहां चमकते हुए स्फटिक मणियोंके मध्य मोतियोंकी मालासे सुशोभित सिंहासनपर आरूढ हैं, जो श्वेत मेघरूपी छत्रसे आच्छादित हैं और वे मेघ ऐसे अमृत रूपी ओसके बूंदका वर्षाव करते हैं जैसे वे पुष्पकी पंखुरियां हों, उन्हें नमन है जिनका शरीर हीरे मोतियोंसे सुशोभित हैं और जिन्होंने हाथमें शंख धारण किया हुआ है।
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