व्यक्तित्त्वके दोषोंके आवरण साधनामें मुख्य अडचन


 

chaitanya-mahaprabhu

चैतन्य महाप्रभु निरंतर भावावस्थामें भगवद् भक्तिमें लीन रहते थे । चैतन्य महाप्रभुसे उनके एक शिष्य ने पूछा, ‘प्रभु ! इतने भक्त भावविभोर होकर आपके पास कीर्तन करते हैं, परंतु उनका जीवन वहींका वहीं बना क्यों रहता है ? साधनामें और प्रगाढता विकसित क्यों नहीं होती ?’
चैतन्य महाप्रभुने कहा, ‘सत्य यह है कि उनमें प्रदर्शन(दिखावा) अत्यधिक है; परन्तु किया कुछ नहीं जाता है । जीवन असंयमके छिद्रोंसे भरा पडा है, चरित्र दुर्बल है । अतएव ऊर्जा संचित नहीं हो पाती है और सब कुछ होनेके पश्चात् भी व्यक्तित्वमें परिवर्तन नहीं होता है और फलस्वरूप साधना वृद्धिंगत नहीं होती है । अध्यात्म जाननेका प्रथम सिद्धान्त है-चरित्रवान होना ।’
शिष्यकी जिज्ञासा बढती चली गई । यह चर्चा और शिष्य भी सुन रहे थे । वे समझ गए कि आज कुछ विशेष ज्ञान मिलनेवाला है । वे उन्हें घेर कर बैठ गए । उस शिष्यने तत्पश्चात् पूछा, ‘प्रभो ! चरित्र व्यक्तित्वका मुख्य केंद्र है, किन्तु कैसे ?’ शिष्यके प्रश्नको सुनकर महाप्रभुने एक लंबी सांस ली और बोले, ‘वत्स ! स्वयंकी प्रगति कौन नहीं चाहता है ? किन्तु धैर्य किसमें निहित है ?  कौन इस हेतु  दीर्घ अवधि तक प्रतीक्षा करना चाहता है ? सर्वप्रथम हमें चरित्र संबंधी धारणामें अपने दृष्टिकोणमें परिवर्तन लाना चाहिए । हमने चरित्रको एक लघु क्षेत्रमें सीमित कर दिया है । जबकि चरित्रकी सीमाएं अत्यंत विस्तारित  हैं । इसकी जडें व्यक्तित्वके धरातलमें धंसी हुई हैं । व्यक्ति चरित्रको सामान्यतः स्त्री-पुरुष संबंधके संदर्भमें ही देखते हैं ; किन्तु हम प्रत्येक व्यक्तिसे कैसा व्यवहार करते हैं ?  यह भी हमारे चरित्रपर ही निर्भर है ।  इसे निखारनेका प्रयत्न करो ।“ चैतन्य महाप्रभुका उत्तर सुन सभी शिष्य चैतन्य महाप्रभुके प्रति नतमस्तक हो गए ।

वस्तुतः हमारा मूल चरित्र ही हमें साधनाकी ओर प्रवृत्त करता है । हम सभी उस परमात्माके अंश हैं, जो शाश्वत आनन्दका अखंड स्रोत है ; हमें भी सदैव आनन्द प्राप्तिकी कामना रहती है । कुछ व्यक्ति सुखको ही आनन्द समझ कर सुखके अन्वेषणमें लगे रहते हैं, जबकि दोनों पृथक हैं । सुख नश्वर है, वहीं प्रभुसे प्रेमका आनन्द शाश्वत है; हमारा लक्ष्य भी एकमात्र यही होना चाहिए कि हम परमात्माको पा लें, हमारी प्रवृत्ति भी यही होती है, किन्तु संसारमें अधिकांश व्यक्तियोंके मनपर पडे स्वभावदोषोंके आवरण इसमें बाधा उत्पन्न करते हैं । अतएव चरित्रको निखारते हुए मनपर पडे आवरणोंके निर्मूलन हेतु प्रयास करना चाहिए । ऐसा प्रयास करते ही चरित्र एवं व्यक्तित्त्वमें परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगेगा !!!



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