गीता सार


द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥ श्रीमदभगवद्गीता (४: २८)

अर्थ : कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करनेवाले हैं, कितने ही तपस्या रूपी यज्ञ करनेवाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करनेवाले हैं,  कुछ स्वाध्याय रूपी ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं तो कितने ही तीक्ष्णव्रतोंको धारण कर साधना करते हैं |

भावार्थ : उपर्युक्त श्लोकमें भगवान श्री कृष्ण सनातन धर्मकी विशेषताके बारेमें बता रहे हैं | धर्म और पंथमें यह मुख्य भेद होता है कि धर्म एक विश्वविद्यालय समान होता है जहां साधनाके भिन्न योगमार्गके माध्यमसे साधक साधनारत रहते हैं | पंथ या संप्रदायमें वह बात नहीं होती वह एक ही प्रकारकी साधना पद्धतिका अनुसरण और प्रतिपादन कर उसका प्रसार करता है | अतः पंथ या संप्रदाय अनुसार साधना करनेवालेकी मानसिकता संकुचित होती है, मेरा पंथ श्रेष्ठ, मेरे पंथके संस्थापक या मेरे आराध्य श्रेष्ठ और मात्र मेरी ही उपासना पद्धति, एकमात्र योग्य उपासना पद्धति है, इस प्रकारकी संकुचित मनोवृत्तिसे सांप्रदायिक साधकमें कूपमंडूकता निर्माण हो जाती है; फलस्वरूप सांप्रदायिक साधना करनेवालेकी आध्यात्मिक प्रगति तीव्र गतिसे नहीं हो पाती है |

इसके विपरीत सनातन धर्म ‘सर्वेषाम अविरोधेन’के सिद्धान्तको मानता है अतः यहां भिन्न पद्धतिसे साधना करनेवालेको समभाव और सम्मानसे देखा जाता है | इससे व्यापकता निर्माण होती है और यह एक ईश्वरीय गुण होनेके कारण साधककी आध्यात्मिक प्रगति भी द्रुत गतिसे होती है | साधनाकी कोई भी पद्धति एक यज्ञ समान है जहां हम भिन्न माध्यमोंसे ईश्वरको अर्विभाव समर्पित कर साधना करते हैं | भगवान श्रीकृष्ण यहां और इसके पश्चातके श्लोकमें भी भिन्न साधना मार्गसे साधना करनेवालोंका उल्लेख करते हुए कहते हैं कि कोई सन्मार्गसे धन कमाकर उसे लोक कल्याणमें अर्पण कर साधना करता है, तो कोई ध्यान-धारणा जैसे तपसे साधना रूपी यज्ञ करता है तो कुछ अन्य साधक अन्य योगयज्ञ अर्थात योग्यमार्गसे साधना करते हैं और कुछ ज्ञानके माध्यमसे अर्थात स्वाध्याय कर साधना करते हैं और कुछ यति अर्थात सन्यासी प्रवृत्तिके साधक दृढ निश्चय कर तीक्ष्ण व्रतोंको साधना रूपमें धारण कर साधनारत रहते हैं |-तनुजा ठाकुर



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